Friday, May 20, 2011

अपने रहे न घने नीम के साए

धान पराया हुआ, हल्दी परायी,
चढ़ गयी नीलामी पर अमराई
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

अपने रहे न घने नीम के साए
गमलों में कांटे ही कांटे उगाये,
पछुवा के रंग में रंगी पुरवाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

पानी तो बिक गया बीच बाजारी,
धूप-हवा की कल आएगी बारी,
सौदागरों ने है मंडी लगाईं.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.

रोज दिखाके नए सपने सलोने,
हाथों में दे दिए मुर्दा खिलोने,
राम दुहाई मेरे राम दुहाई.
ऐसी विदेसिया ने करी चतुराई.
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1 comment:

  1. bahut khoob uncle aaj meine 1 he kavita padhi kuinki time kam tha par me dhire dhire sabhi padhuingi kuinki pahli he itni acchi hai ke aage bhi padhne ko man tatpar ho raha hai ..........prannam uncle and thaks for giving this good sahitya.....

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